शनि देव का खगोलिय स्वरूप

बृहस्पति के बाद बड़े ग्रहों में शनि का स्थान प्रमुख है। नीले वर्ण का यह ग्रह सूर्य से 142600000 कि. मी. की दूरी पर स्थित है। शनैश्चर अत्यंत मंद गति से चलने वाला यह ग्रह 29 वर्षों में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करता है। शनि आकार में केवल बृहस्पति से ही छोटा है। इसका व्यास 1,20,500 कि. मी. है। इसका बृहस्पतित्व पृथ्वी के बृहस्पतित्व से 65 गुना अधिक है। नौ चंद्रमा शनि ग्रह की परिक्रमा करते हैं, उनमें से छठा चंद्र मंदी सबसे बड़ा होता है। शनि ग्रह अस्त होने के 38 दिन बाद उदय होता है। उदय के 135 दिन बाद यह मार्गी होता है। मार्गी के 105 दिन बाद यह पश्चिम में पुनः अस्त हो जाता है। शनि को काण, अर्कपुत्र, छायातनुज, असित, नील, मंद, खंज आदि नाम दिए गए हैं। शनि की गति— शनि ग्रह सूर्य का परिक्रमा 29 वर्ष 5 महीने 16 दिन, 23 घण्टा और 16 मिनट में करता है। यह अपनी धुरी पर 17 घण्टा 14 मिनट 24 सेकंड में एक चक्कर लगाता है। स्थूल मान से यह एक राशि पर 30 महीने, एक नक्षत्र पर 400 दिन और एक नक्षत्र पाद पर 100 दिन रहता है। यह प्रति वर्ष चार महीने वक्री और आठ महीने मार्गी रहता है। सूर्य से 15 डिग्री अंश की दूरी पर शनि ग्रह अस्त हो जाता है। अस्त होने के 38 दिन बाद उदय होता है। उदय के 135 दिन बाद मार्गी होता है और मार्गी के 105 दिन बाद पश्चिम दिशा में पुनः अस्त हो जाता है। यह प्रायः 140 दिन तक भी वक्री रह जाता है तथा वक्री होने के 5 दिन आगे या पीछे तक यह स्थिर रहता है। गणितागत स्पष्टीकरण से जब यह सूर्य से चौथी राशि को समाप्त करता है तो वक्री हो जाता है। जब वक्री से 120 डिग्री अंश चलता है तो मार्गी हो जाता है। जब इसकी गति 7/45 की होती है तब यह अतिचारी हो जाता है। सूर्य से दूसरी और बारहवीं राशि पर शीघ्रगामी, तीसरी और ग्यारहवीं पर समचारी, चौथी पर मंदचारी, पाँचवीं और छठी पर वक्री, सातवीं और आठवीं पर अति वक्री तथा नौवीं तथा दसवीं पर कुटिल गति वाला होता है।