How important is Vastu Shastra in a every person's life
सब सुखी हों। सभी निरोगी हों। सब कल्याण को देखें। किसी को लेशमात्र दुःख न हो।
शास्त्रों ने रूपकों का उपयोग कर सिद्धान्तों की चर्चा की है। यह उनकी अपनी एक विशेष शैली है। इससे रहस्य का रहस्य बना रहता है और जिसे वे चाहते हैं रहस्य बताना, उसे वे सब कुछ स्पष्ट शब्दों में समझा भी देते हैं। वास्तुशास्त्र के बारे में ऐसा ही एक रूपक आया है।
कथा है कि वैदिक युग के प्रारम्भ में एक शरीरधारी प्राणी ने जन्म लिया। जन्म लेने वाला शिशु नहीं, वयस्क पुरुष के समान तन-मन से विकसित था। इन्द्रादि देवता उसके जन्म से सशंकित एवं भयभीत हो उठे। दिनों के साथ-साथ उसका शरीर विस्तार पाता गया। एक दिन उसका शरीर इतना बड़ा हो गया कि उसके लिए स्वर्ग में समाना दुष्कर हो गया।
तब देवताओं ने उससे मुक्ति पाने के लिए एक विशाल गड्ढा खोदा और उसके हाथ-पैरों को मोड़-तोड़कर गाड़ दिया। इसी का नाम देवताओं ने वास्तुपुरुष रखा। वास्तुपुरुष की यह स्थिति ही आगे चलकर वास्तुशास्त्र का आधार बनी।
वास्तुशास्त्र इसी वास्तुपुरुष की स्थिति को अपना मूल आधार मानता है। इसके अतिरिक्त इस शास्त्र में इस बात का भी बड़ी बारीकी से प्रतिपादन किया गया है कि भूमि का चयन कैसे किया जाए तथा मिट्टी की प्रकृति के अनुसार उसका उपयोग किस प्रकार हो।