आज हम जानेंगे भगवान श्री गणेश जी, स्वास्तिक क्यों बनाया जाता है और स्वास्तिक के कितने फायदे हैं
किस कारण से स्वास्तिक में ऐसी महत्ता है जिसका कारण शीघ्र विघ्नों का नाश होता है एवं गणपति को प्रथम पूज्य माना है, इसके लिये हमको स्वास्तिक के रहस्य को जानना पड़ेगा। गणपति ही आदि ब्रह्मा हैं, जिनका तेज सूर्य के समान है, ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं। प्रत्यक्ष रूप में सूर्य दूषित वातावरण, कीटाणुओं का नाश करता है, उसी तरह स्वास्तिक हमारे जीवन के, कार्यों के विघ्नों का नाश करता है।
वेद में कहा है -
स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवा:; स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा: ।
स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमि:; स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ।।
अर्थात् इंद्र, वृद्धश्रवा (लंबे कानो वाला अर्थात् चित्रा नक्षत्र के स्वामी) हमें सुख प्रदान करें। पूषा, विश्ववेदा (रेवती नक्षत्र के स्वामी) हमें आनन्द प्रदान करें। अनिष्ट का नाश करने वाले विष्णु (श्रवण नक्षत्र के स्वामी) हमें कल्याण करें। बृहस्पति (पुष्य नक्षत्र के स्वामी) हमें सुख प्रदान करें और मंगल करें।
अगर हम नक्षत्रों के समूह को देखें, मध्य में सूर्य को मानकर देखें तो चित्रा (27वें नक्षत्र) रेवती से एक रेखा खींची रेखा नीचे की ओर खींचें और रेखा बाईं तरफ तथा 8वें नक्षत्र पुष्य नक्षत्र से एक रेखा दाईं तरफ खींचें तो एक चौराहा सा बनेगा जिसकी चौड़ाई एक नक्षत्र के माप के समान होगी। इसमें पुष्य नक्षत्र से 14वाँ नक्षत्र चित्रा, श्रवण और रेवती से 15वाँ नक्षत्र चित्रा हुआ।
अतः जब आकाश समूह में नक्षत्रों की किरणें जो भेद इस अंतर में होता है तो उस क्षेत्र में विशेष चुंबकीय या ऊर्जा शक्ति उत्पन्न होती है जो समस्त ग्रहों के समूह को सही तरह से चलाने का कारण होती है एवं प्राकृतिक रचना का कारण होती है।
इस ऊर्जा की गति पृथ्वी की तरह पश्चिम से पूर्व की ओर मानने से (भुजाएँ प्रदान करने से) स्वास्तिक के रूप में ही हो गई जो कल्याणकारी है।
इन नक्षत्रों का हमारे शरीर पर भी प्रभाव पड़ता है। पुष्य का सिर पर (बुद्धि, स्थानबल) चित्रा (हृदय, आत्मबल) श्रवण (नाभि, केंद्र - ओज) रेवती (पैर - पुरुषार्थबल) पर प्रभाव है। अगर इन चारों बलों का एक साथ उपयोग कर कोई कार्य करें तो अवश्य सफलता मिलेगी। इसी कारण स्वास्तिक का हमारे जीवन में बड़ा महत्व बन गया है।
अतः ग्रह, नक्षत्र, सौर मंडल की सभी रची गई वस्तुएँ इस ऊर्जा से प्रभावित हैं।
जिस तरह मंगल, शनि, गुरु जब एक दूसरे से छठे आठवें राशि में आते हैं तो कई चमत्कारी घटनाएँ, परिणाम अचानक सामने आते हैं और उसी तरह इन नक्षत्रों का एक दूसरे से 14वें-15वें स्थान में होने से विशेष ऊर्जा प्राप्त होती है और इस कारण स्वास्तिक हमें सदैव ध्यान में रखना चाहिए।इस ऊर्जा का जब आकाश में प्रभाव पड़ता है तो पृथ्वी पर भी प्रभाव पड़ेगा ही।
हमारा जीवन, हमारा आवासस्थल, आस-पास की भौगोलिक स्थिति भी स्वास्तिक की तरह हमारे लिये कल्याणकारी होवे उस सिद्धांत को समझने के लिये हमें वास्तुशास्त्र का ज्ञान करना आवश्यक है, जिसमें भूमि चयन, निर्माण, आवास, प्रकृति से संबंध, दिनचर्या की सभी वस्तुओं का समावेश हो।
हमारी पृथ्वी व आवास स्थल का ऊर्जा केन्द्र जिस बल के रूप में कार्य में सहायता व प्रभाव करता है अगर उसे पुरुष मानें तो "वास्तु पुरुष" कह सकते हैं।
सृष्टि सृजन कर्ता सूर्य "विश्वकर्मा" है तो वास्तु उसका अनन्य सेवक है। सूर्य अगर शिव है, विकार जहां अंधक दैत्य है, दोनों के टकराव (काम) से वस्तु की उत्पत्ति है, परन्तु वह काम - कार्यवास्तु हमारे लिये कैसे सहायक हो यह जानना जरूरी है।